बेटियाँ - दौर ए हाजिर मे हिफ़ाज़त फिर से पाए बेटियाँ



आज कल तो समझी जाती हैं बालाएँ बेटियाँ,
क्यूँ जहाँ मे ठोकरे खाने को आयी बेटियाँ !

कितनी ही मासूम कलियो को मसल देते है खुद,
भगवान क्या तेरे हाथो मरने आयी है बेटियाँ !

हर गली कुचें मे बैठे है हवस के भेड़िए,
घर मे भी अब सुरक्षित है नही ये बेटियाँ !

कहने को इंसान है पर कम है शैतान के,
हर दरिंदो की ये मंशा बच ना पाए बेटियाँ !

जीना है मजबूरी इनकी जी रही है इस तरह,
रत दिन अपना जनाज़ा बस उठाए बेटियाँ !

ए खुदा इस गर्दिश ए हालत को अब फेर दे,
दौर ए हाजिर मे हिफ़ाज़त फिर से पाए बेटियाँ!!!